शाम के बुझते हुए माहौल

ज़िल्लतें कितनी सहीं तब जाके नाकारा हुआ. तुम न समझोगे कि मैं किस तर्ह आवारा हुआ. शाम के बुझते हुए माहौल के पेशे-नज़र मैं भी अब वापस चला घर को थका हारा हुआ. इन दिनों हर चीज़ की तासीर उल्टी हो गयी बर्फ के पहलू में मैं बैठा तो अंगारा हुआ. मुद्दतों ठंढी हवाओं में… Continue reading शाम के बुझते हुए माहौल

हौसलों की सरजमीं पे इक महल सपनों का था

हौसलों की सरजमीं पे इक महल सपनों का था. पाओं दलदल में फंसे थे और सफ़र सदियों का था. हमको जो बख्शी गयी वो सल्तनत फूलों की थी और माथे पर जो आया ताज वो कांटों  का था. मात जब होने को आई तब कहीं जाकर खुला सारे प्यादे बेसबब थे खेल तो मोहरों का था.… Continue reading हौसलों की सरजमीं पे इक महल सपनों का था

कोई क्या है, पता चलता है कुछ भी

कोई क्या है, पता चलता है कुछ भी ? किसी की शक्ल पे लिक्खा है कुछ भी?   गवाही कौन देगा अब बताओ? किसी ने भी नहीं देखा है कुछ भी.   अगर ताक़त है तो कुछ भी उठा लो कि मांगे से नहीं मिलता है कुछ भी.   खयालों के उफक पे खामुशी है… Continue reading कोई क्या है, पता चलता है कुछ भी

सियासत चल पड़ी

सियासत चल पड़ी बन-ठन के बाबा! हजारों फन हैं इस नागन के बाबा! अलग होता गया रेशे से रेशा यही होने थे गठबंधन के बाबा! वहीं चलकर जरा हम आंख सेंकें जहां अंधे मिलें सावन के बाबा! हमेशा मौत के सदके उठाये रहेगी जिन्दगी से ठन के बाबा! किनारा कर चुके हैं हर किसी से न अब हम… Continue reading सियासत चल पड़ी

जमीं की गोद में सारा फलक है

हवा चुप है, फ़ज़ाओं में कसक है, गौर से देखो. ये किस मौसम के आने की धमक है? गौर से देखो. बुलंदी और पस्ती एक ही सिक्के के दो पहलू जमीं की गोद में सारा फलक है, गौर से देखो. मैं सच कहता हूं, मैं सच के सिवा कुछ भी नहीं कहता मेरे माथे पे… Continue reading जमीं की गोद में सारा फलक है

जिंदगी तार-तार है

हर कोई बेक़रार है बाबा! जाने कैसा दयार है बाबा ! जिंदगी तार-तार है बाबा! मौत का इंतज़ार है बाबा! आओ मिलजुल के हम चुका डालें कुछ जमीं का उधार है बाबा! अब तो कुछ भी नज़र नहीं आता कैसा गर्दो-गुबार है बाबा! पूरे होंगे हमारे सपने भी वक़्त का इंतज़ार है बाबा! लोग कांटों से… Continue reading जिंदगी तार-तार है

अब हद से गुजर जाने दे.

गर यही हद है तो अब हद से गुजर जाने दे. ए जमीं! मुझको खलाओं में बिखर जाने दे. रुख हवाओं का बदलना है हमीं को लेकिन पहले आते हुए तूफाँ को गुज़र जाने दे . तेरी मर्ज़ी है मेरे दोस्त! बदल ले रस्ता तुझको चलना था मेरे साथ, मगर जाने दे. ये गलत है… Continue reading अब हद से गुजर जाने दे.

जिंदगी की उड़ान बाकी है.

थोड़ी हरकत है, जान बाकी है. जिंदगी की उड़ान बाकी है. सारे कुनबों को दफ्न कर डाला एक ही खानदान बाकी है. बस्तियों का सुराग देने को फूस का इक मकान बाकी है. कोई राधा तो खिंच के आएगी अभी बंशी में तान बाकी है. वक़्त ने भर दिया जरूर मगर जख्म का इक निशान… Continue reading जिंदगी की उड़ान बाकी है.

बोझ बेमंजरी का ढोने दे.

बोझ बेमंजरी का ढोने दे. खुश्क आखों को कुछ भिंगोने दे. हम भी चेहरा बदल के निकलेंगे शाम ढलने दे, रात होने दे. उसके तलवों में जान आएगी एक कांटा जरा चुभोने दे. सब्ज़ हो जाएगी जमीं इक दिन आसमानों को सुर्ख होने दे. हर नई बात मान लें कैसे कुछ रिवाजों का बोझ ढोने… Continue reading बोझ बेमंजरी का ढोने दे.

आते हुए तूफ़ान को छूने की जिद न कर.

आते हुए तूफ़ान को छूने की जिद न कर. रहने दे आसमान को छूने की जिद न कर. रह-रह के टीसता है मेरी उंगलियों का जख्म अब तीर और कमान को छूने की जिद न कर. मलवे में दफ्न होंगी किस-किस की ख्वाहिशें उजड़े हुए मकान को छूने की जिद न कर. कडवी है कि मीठी… Continue reading आते हुए तूफ़ान को छूने की जिद न कर.