हौसलों की सरजमीं पे इक महल सपनों का था

हौसलों की सरजमीं पे इक महल सपनों का था.

पाओं दलदल में फंसे थे और सफ़र सदियों का था.

हमको जो बख्शी गयी वो सल्तनत फूलों की थी

और माथे पर जो आया ताज वो कांटों  का था.

मात जब होने को आई तब कहीं जाकर खुला

सारे प्यादे बेसबब थे खेल तो मोहरों का था.

मुझसे जो लिपटे हुए थे आस्तीं के सांप थे

सर पे जो मंडरा रहा था काफिला चीलों का था.

हमसे पहले भी यहां पे रस्म नजराने की थी

बात चाहे जब खुली हो सिलसिला सदियों का था.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *