आते हुए तूफ़ान को छूने की जिद न कर.

आते हुए तूफ़ान को छूने की जिद न कर. रहने दे आसमान को छूने की जिद न कर. रह-रह के टीसता है मेरी उंगलियों का जख्म अब तीर और कमान को छूने की जिद न कर. मलवे में दफ्न होंगी किस-किस की ख्वाहिशें उजड़े हुए मकान को छूने की जिद न कर. कडवी है कि मीठी… Continue reading आते हुए तूफ़ान को छूने की जिद न कर.

कुछ रोज आसपास रहे, फिर कहां गए.

कुछ रोज आसपास रहे, फिर कहां गए.  खुशरंग जिंदगी के मनाज़िर कहां गए. बातिन में भी नहीं हैं बज़ाहिर कहां गए. जिनकी मुझे तलाश है आखिर कहां गए. महरूमियों के दर पे खड़े सोचते हैं हम  वो हौसले हयात के आखिर कहां गए. हर गाम पूछने लगीं सदरंग मंजिलें बेकैफ रास्तों के मुसाफिर कहां गए.… Continue reading कुछ रोज आसपास रहे, फिर कहां गए.

उतर चुकें हैं सभी इस कदर जलालत पर

उतर चुकें हैं सभी इस कदर जलालत पर. कोई सलाख के पीछे कोई जमानत पर. यहां किसी से उसूलों की बात मत करना बिका हुआ है हरेक सख्स अपनी कीमत पर. यकीन मानो कि सूरज पनाह मांगेगा उतर गया कोई जर्रा अगर बगावत पर. हुआ यही कि खुद अपना वजूद खो बैठा वो जिसने दबदबा… Continue reading उतर चुकें हैं सभी इस कदर जलालत पर

अक्ल की उंगली पकड़ ले

हादिसा ऐसा कि हर मौसम यहां खलने लगे. बारिशों की बात निकले और दिल जलने लगे. फितरतन मुश्किल था लेकिन जो हमें बख्शा गया रफ्ता-रफ्ता हम उसी माहौल में ढलने लगे. काश! ऐसा हो कलम की नोक बन जाये उफक वक़्त का सूरज मेरी तहरीर में ढलने लगे. अक्ल की उंगली पकड़ ले, दिल के… Continue reading अक्ल की उंगली पकड़ ले

कहां -कहां की फ़ज़ा याद आ गयी गौतम

हरेक सांस में आता है गाम-गाम धुआं. बदल के रख दो मेरी जिंदगी का नाम धुआं. बहुत करीब है जैसे घुटन की रात कोई उड़ा रही है मेरी बेबसी की शाम धुआं. हरेक सम्त है कुहरा घना जिधर देखो हुआ है आज तो जैसे कि बेलगाम धुआं. किसी के अश्क बहे बोझ कम हुआ दिल… Continue reading कहां -कहां की फ़ज़ा याद आ गयी गौतम

ज़िल्लतें कितनी सहीं

ज़िल्लतें कितनी सहीं तब जाके नाकारा हुआ. तुम न समझोगे कि मैं किस तर्ह आवारा हुआ. शाम के बुझते हुए माहौल के पेशे-नज़र मैं भी अब वापस चला घर को थका हारा हुआ. इन दिनों हर चीज़ की तासीर उल्टी हो गयी बर्फ के पहलू में मैं बैठा तो अंगारा हुआ. मुद्दतों ठंढी हवाओं में… Continue reading ज़िल्लतें कितनी सहीं